हिंदी दिवस

 सुप्रभात दोस्तों 🙏💐

प्रिय स्नेहीजनों हिंदी दिवस की अपार शुभकामनाएं 🙏🖊

“The limits of my language mean the limits of my world.” – Ludwig Wittgenstein

बचपन का एक किस्सा याद आता है जब पड़ोस में रहने वाली दक्षिण भारतीय आंटी को अपने एक साल के नन्हें भाई से बात करते पाया, "इंगे वा.. छिन पापा" और नन्हा किलकारियां ले रहा था, वो कैसे यह भाषा जान गया, मां से जब पूछा तो उन्होंने कहा कि यह वातसल्य की भाषा है. उस समय तमिल मारवाड़ी बांग्ला व सिंधी को सीखने के अवसर मिले अपने पड़ोसी व स्कूल के मित्रों के संपर्क में आ. पिता जी एयर फोर्स में थे और नियमित स्थानांतरण उसका एक भाग. बाद में उर्दु व रुसी भाषा को भी समझना व लिखना सीखा. जाना कि प्रत्येक भाषा में अपना अलग तरह का लगाव होता है और आप जुड़ते चले जाते हैं, बशर्ते कि आपका दिल अपने सही स्थान पर हो. यह कि 'हम ने देखी है इन आँखों की .. हाथ से छूके ... सिर्फ़ एहसास है ये रूह से .... '

भाषा केवल शब्द नहीं एहसास है कहने वाले का और सुनने वाले का. वरना कितना बोला जाता है पर सुना नहीं जाता. कुछ लोग तो चेहरे की भाषा पढ़ लेते हैं और कुछ आंखों की. 'उसको नहीं देखा हमने कभी पर इसकी ज़रूरत क्या होगी ऐ माँ ऐ माँ तेरी सूरत से अलग..' तो जब तक आप भी पारंगत नहीं हो जाते, मेरे जैसे, बिन बोले अपनी बात प्रकट करने में तब तक भाषा का सहारा लीजिए.


'हिंदी मातृ रूपिणी पुनीत है पवित्र है, ज़मीन वारि वायु का समान ही चरित्र है'. हिंदी को अपनी पवित्रता की कोई अग्नि परीक्षा नहीं देनी है और न मांग कर अपनी झेंप मिटायें. भाषा की स्वयम् में अन्य भाषा से कोई तकरार नहीं, एक सहज आदान प्रदान है एक बेल सी विकसित होने का जिस पर नाना प्रकार के पक्षी और छोटे जीव घर बना लेते हैं. भाषा और वाणी में अंतर से भी हम भ्रमित हो जाते हैं यदा कदा. जिसकी लाठी उसकी भैंस के प्रयोग से हम सब परिचित हैं जब पिता के क्रोध से बच्चे में कुंठा विकसित होती है और मां बहुत कुछ स्नेह से सिखा देती है इतना कि मां से पिटते समय भी बच्चा "मां मां" कहता है. कोई भी सरल शब्द, भले ही किसी अन्य भाषा का, अगर व्यक्त करने का माध्यम बनता है तो उसे अपनाना ही श्रेयस्कर है. 

अनर्गल सीमाओं से बचें. और 'वे तैनु समझावाँ की....... '

प्रस्तुत है एक कविता

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